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स्व. श्री हरीओम सिंह जी राठौड़, पूर्व सांसद राजसमन्द की प्रथम पुण्यतिथि पर भाव शब्दांजली

स्व. श्री हरीओम सिंह जी राठौड़, पूर्व सांसद राजसमन्द की प्रथम पुण्यतिथि पर भाव शब्दांजली

स्व. श्री हरीओम सिंह जी राठौड़, पूर्व सांसद राजसमन्द की प्रथम पुण्यतिथि पर भाव शब्दांजली

प्रेम और मानवीयता के गुणों से लकदक उस महान आत्मा के मधुर स्मृति चिन्ह, आज भी मेरे मानस उपवन में सुवासित सुमन की मानिंद पुलकायमान है। 
मेरे लिए यह पुण्य स्मृति विरह वेदनाओं को महसूस करने वाली पराकाष्ठा की वह वेला है जहां आत्मा के सारे तार अपने आप ही सरगम की तरह बज उठते हैं। किसी भी सप्तक में जाकर मन को झंकृत करूँ, स्वर वेदना के ही निकलने हैं। 
ह्रदय के अंतः पटल पर स्वजनों की मधुर स्मृतियां एक परिपूर्ण फसल की मानिंद तभी लहलहाती है, जब एहसास की मिट्टी में सिर्फ अपनत्व की खाद से उसे सींचा जाता हो।
देखते ही देखते कैसे उस महान देव स्वरूप का युगांत हो गया…मानो कल ही कि बात हो। उस महान आत्मा के विचार रह रह कर मन के अंतःकरण में कौंध जाते है, जिसकी क्षतिपूर्ति जीवन पर्यंत अपूर्ण ही रहेगी।
सोचता हूँ तो अफ़सोस के साथ दिल बैठ जाता है….. उस पथ प्रणेता देव पुरुष की सांसारिक रिक्तता ने मेरे जैसे अनेकों ह्रदयों को सिंधु तट की उस गहराई का अहसास करा दिया है जिसमे लाख डुबकियां लगाओ लेकिन फिर भी उस जैसा मोती ढूंढना मुमकिन नहीं है। 
 निशापरांत भी उनकी यादों को एक शिद्दत से मन में संजोए हैं जैसे उनके आगमन की वेला सामने ही खड़ी हो ! स्नेह और मित्रता के पवित्र धागे को विश्वास के मजबूत मांजे में भिगोया था, बिसारना अगर अपने हाथों में होता तो स्वयं को ही बिसरा जाते।
वो क्षण कितना कठीन हो जाता है ..जब आपको मालूम होता है की सफ़र अब यहीं खत्म होना है। एक ने रास्ता बदला, उधर बहुतों की दुनियां बदल गई। उनके नहीं होने से शायद बहुत कुछ पीछे छूट गया है लेकिन यह भी अटल सत्य है कि पंचभूत में व्यक्ति का शरीर विलीन होता है व्यक्ति के विचार नहीं। वो एक विचार के रूप में आज भी हमारे अंदर, हमारे आसपास मौजूद है। मित्रता के अंतरंग क्षणों को विस्मृत करना स्वयं के लिए असम्भव है। 
एक शिक्षक की भांति सिखाए गए उनके सबक आज भी वर्तमान राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक परिवेश में उनके विचारों को प्रासंगिक बना जाते हैं। निष्कपट भाव के साथ सम्प्रेषित विचारों की श्रृंखला किसी भी व्यक्ति के व्यक्तित्व को अलौकिक बना देती है जो हर समय दिव्यता का आभास कराती है। लेकिन ईश्वर का यह केसा विचित्र लेखा है…  जहां राजनीति का दंभी रावण व नाक कटी सूर्पणखा, चिरकाल तक धरती का बोझ बढाते हैं। वहीं सुमन स्वभाव के कर्म योगी विवेकानन्द की तरह अल्पायु हो जाते हैं।
 महत्वपूर्ण यह नहीं है कि… कोई जीवन के कितने बसन्त निकालता है, महत्वपूर्ण यह है कि वो कैसे निकालता है। 
मानवीय, सामाजिक और राष्ट्रीय संवेदनाओं के संवाहक परम् आदरणीय भाईसाब स्व. श्री हरिओम सिंह जी राठौड़ (पूर्व सांसद) की प्रथम पुण्यतिथि पर हम सभी मित्र अश्रुपूरित भाव शब्दांजली व श्रद्धा सुमन अर्पित करते हैं।